सोमवार, 20 दिसंबर 2010

path ki pahachan

स्वप्न आता सर्वग का , दर्ग - कोरको में दीप्ति आती, पंक लग जाते पगों को, ललकती  उन्मुक्त छाती , रास्ते का एक कांता पांव  का दिल  चीर देता, रक्त की दो बूंद गिरती, एक दुनिया डूब जाती , ''आँख में हो सर्वग लेकिन पाँव प्रथ्वी पर टिके हों, कंटको की इस अनोखी सीख का का सम्मान करले, पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान करले!

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