स्वप्न आता सर्वग का , दर्ग - कोरको में दीप्ति आती, पंक लग जाते पगों को, ललकती उन्मुक्त छाती , रास्ते का एक कांता पांव का दिल चीर देता, रक्त की दो बूंद गिरती, एक दुनिया डूब जाती , ''आँख में हो सर्वग लेकिन पाँव प्रथ्वी पर टिके हों, कंटको की इस अनोखी सीख का का सम्मान करले, पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान करले!